पहली बार लाखामंडल पहुंची सोमेश्वर महाराज की डोली, पांडव नृत्य से गूंजा ऐतिहासिक धाम

– खरसाली से पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच पहुंचे 12 गांव गीठ पट्टी के आराध्य देव ,
– ग्रामीणों ने किया भव्य स्वागत, डोली के सानिध्य में हुआ पांडव नृत्य

उत्तराखंड एक्सप्रेस ब्यूरो

उत्तरकाशी

पांडवों की आस्था और 33 कोटि देवी-देवताओं की ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थली लाखामंडल में सोमवार को पहली बार खरसाली से 12 गांव गीठ पट्टी के आराध्य देव सोमेश्वर महाराज की डोली पहुंची तो पूरा क्षेत्र धार्मिक उल्लास से गूंज उठा।

मां यमुना के शीतकालीन प्रवास स्थल खरसाली से पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और जयकारों के बीच डोली लाखामंडल पहुंची। डोली के साथ 12 गांव गीठ पट्टी के देवी-देवताओं के पश्वा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचे। जहां लाखामंडल वासियों ने देव डोली और श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर सोमेश्वर महाराज की डोली के सानिध्य में पांडव नृत्य भी हुआ।

यात्रा आयोजक पुरुषोत्तम उनियाल ने बताया कि पिछले वर्ष खरसाली गांव में पांडवों ने आराध्य देव सोमेश्वर महाराज की मौजूदगी में लाखामंडल में पांडवों का श्राद्ध कराने की इच्छा जताई थी। इसी संकल्प के तहत सोमवार को सोमेश्वर महाराज की अगुवाई में 12 गांव गीठ पट्टी के देवी-देवताओं के पश्वा और क्षेत्र के लोग लाखामंडल पहुंचे। यहां पहुंचने पर स्थानीय ग्रामीणों ने सभी का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया।

उन्होंने बताया कि देव डोली के सानिध्य में पांडव नृत्य का आयोजन किया गया, जिसमें पारंपरिक धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का निर्वहन किया गया। इस दौरान पूरा लाखामंडल क्षेत्र ढोल-दमाऊं और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन से गूंजता रहा। साथ ही यहां भंडारे का भी आयोजन किया गया।

पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है लाखामंडल

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लाखामंडल को पांडवों की आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है। मान्यता है कि पांडवों ने यहां बद्री-केदार समेत 33 कोटि देवी-देवताओं की आराधना की थी। लाखामंडल में समय-समय पर खुदाई के दौरान मिली प्राचीन देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक व प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है।

स्थानीय लोगों ने कहा कि सोमेश्वर महाराज की डोली का पहली बार लाखामंडल पहुंचना केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि रवांई-जौनसार क्षेत्र की साझा धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के जुड़ने का ऐतिहासिक अवसर है। देव डोली के आगमन से क्षेत्र के लोगों में विशेष उत्साह रहा और श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।

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