जयप्रकाश बहुगुणा
*उत्तरकाशी*
ग्राम पंचायत चकोन में विगत नौ दिनों से गांव की ईष्ट देवी थात माता मंदिर में हर तीन वर्ष में होने वाली थात माता की पूजा का कल रात्रि पांच पांडवों,गांव की ईष्ट देवी नांगणी, हूण ,लाडबुडा , के सानिध्य में पूर्णाहुति के साथ आज पांडवों के द्वारा गैंडा वध के साथ समापन हुआ।
इस अवसर पर ग्राम चकोन वासियों के साथ साथ धनारी क्षेत्र के विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में लोगों ने यहां पहुंच कर कर पांडवों के पश्वाओं से क्षेत्र की सुख एवं समृद्धि का आशीर्वाद लिया ,इस अवसर पर गांव के पंच परमेश्वर लखन सिंह पवार, नत्थी सिंह राणा,ने बताया कि थात माता की पूजा जिसमें पूर्व में पशु बलि प्रचलित थी हमारे पूर्वजों द्वारा इसे समय के साथ सही नहीं मानते हुए इसे सैकड़ों वर्ष पूर्व समाप्त करने का निर्णय लिया था , उसी परंपरा को हम सभी ग्रामवासी आगे बढ़ते हुए देवी की पूजा पाठ हवन ,पूजा और नौ दिवसीय यज्ञ के रूप में इसे निरंतर जारी रखे हुए हैं। उन्होंने बताया थात की पूजा पाठ व पांडव नृत्य विशेष कर गांव व क्षेत्र की सुख समृद्धि खुशहाली के लिए हर तीन वर्ष में होती है।
इस अवसर पर स्थानीय निवासी राजेंद्र गंगाडी ने बताया नौ दिन तक चली पांडव लीला के पांडवों के जीवन पर आधारित विभिन्न घटनाओं का वृतांत नृत्य के माध्यम से प्रदर्शित किया गया।पांडव नृत्य से जहां गांव में खुशी और रौनक लौट आई वहीं युवा पश्वाओं भी अपनी परंपरा और लोक संस्कृति को देख खुश थे।
पाण्डव नृत्य देवभूमि उत्तराखण्ड का पारम्परिक लोकनृत्य है। पाण्डव गण अपने अवतरण काल में यहाँ वनवास, अज्ञातवास, शिव जी की खोज में और अन्त में स्वर्गारोहण के समय आये थे। महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने अपने विध्वंसकारी अस्त्र और शस्त्रों को उत्तराखंड के लोगों को ही सौंप दिया था और उसके बाद वे स्वार्गारोहिणी के लिए निकल पड़े थे, इसलिए अभी भी यहाँ के अनेक गांवों में उनके अस्त्र- शस्त्रों की पूजा होती है और पाण्डव लीला का आयोजन होता है ।
वृहद् आयोजन के दौरान गढ़वाल में भौगोलिक दृष्टि से दूर दूर रहने वाली पहाड़ की बहू- बेटियां अपने मायके आती हैं, जिससे उनको वहाँ के लोगों को अपना सुख दुःख बताने का अवसर मिल जाता है।इस अवसर पर गैंडा वध देखने के लिए धनारी क्षेत्र के दर्जनों गांव के ग्रामीण यहां पहुंचे थे।