Exclusive : भीड़, बेचैनी और भविष्य की तलाश: देहरादून से कांग्रेस का आत्ममंथन

 

 

रिपोर्ट : शीशपाल गुसाईं , परेड ग्राउंड, कैंट रोड से लौटकर

 

पर्वतों की गोद में बसी देहरादून घाटी ने 16 फरवरी को एक परिचित दृश्य देखा—लाल, हरे और सफ़ेद झंडों से भरा परेड ग्राउंड; नारों की गूंज; और लंबे अरसे बाद सड़क पर उतरी वह भीड़, जिसे भारतीय राजनीति में “विपक्ष की सांस” कहा जाता है। चकराता के वरिष्ठ विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह द्वारा एक माह पहले घोषित राजभवन घेराव का यह दिन केवल एक कार्यक्रम नहीं था—यह कांग्रेस के भीतर सुलग रही बेचैनी का सार्वजनिक प्रकटन था।

भीड़ आई—दूर-दराज़ के गांवों से, पहाड़ की पगडंडियों से, और कस्बों की तंग गलियों से। राजभवन से एक किलोमीटर पहले पुलिस की बैरिकेडिंग ने मार्च को रोक दिया। परेड ग्राउंड से लगभग एक तिहाई लोग आगे नहीं बढ़ पाए—कुछ बुजुर्ग थे, कुछ थकान के मारे लौट गए। फिर भी, 2022 के चुनावी उबाल को छोड़ दें तो लगभग एक दशक बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के चेहरे पर वैसा ही जोश और वैसा ही आक्रोश दिखा। यह आक्रोश सत्ता के विरुद्ध था, पर उससे अधिक अपने भीतर की असफलताओं के विरुद्ध भी।

उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस आज एक असहज यथार्थ से जूझ रही है—विधानसभा में सत्ता से बेदखली, लोकसभा में राज्य से शून्य उपस्थिति और पंचायतों में कमजोर पकड़। 2022 में भाजपा से लगभग छह प्रतिशत वोटों के अंतर से हार—यह पराजय मात्र संख्यात्मक नहीं थी; यह संगठनात्मक शिथिलता का परिणाम थी। हरीश रावत के नेतृत्व में लड़ा गया चुनाव भीतरखाने की गुटबाजी के बोझ तले दबा रहा। राजनीति में हार केवल विरोधी की ताकत से नहीं होती—अक्सर वह अपनी ही बिखरी हुई इच्छाशक्ति का दंड होती है।

यदि 2017 से 2022 के बीच कांग्रेस ने गांव-गांव, वार्ड-वार्ड संगठन के ताने-बाने बुने होते, तो शायद 2022 की सुबह कुछ और होती। पर संगठन का काम धैर्य मांगता है—वह चुनावी हवा के भरोसे नहीं चलता। यही वह बिंदु है जहाँ कांग्रेस बार-बार चूकती रही है। आज 2026 की ओर बढ़ते हुए भी भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस का बूथ-स्तरीय ढांचा कमजोर है। राजनीति का गणित बताता है कि भीड़ से तस्वीर बनती है, पर जीत संगठन से आती है।

रैली के बीच कार्यकर्ताओं से हुई बातचीत में एक साझा पीड़ा उभरकर आई—ऊपर के स्तर की गुटबाजी। गांव से आए साधारण कार्यकर्ता इस बात से थके हुए हैं कि नेतृत्व की आपसी खींचतान का खामियाज़ा अंततः उन्हें भुगतना पड़ता है। उनकी मांग बहुत बड़ी नहीं है—उन्हें दिशा चाहिए, निरंतरता चाहिए, और यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट नहीं चढ़ेगी।

हरीश रावत का राजनीतिक जीवन उत्तराखंड के इतिहास का एक अध्याय है—करीब पाँच दशक पहले सांसद बनने वाले नेता ने कभी मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर चेहरे को प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखाया था। समय ने भूमिका बदली है। आज आवश्यकता शायद उस अनुभव की है जो मार्गदर्शन बने—संरक्षण बने। राजनीति में परिपक्वता यही है कि नेता स्वयं को संस्था के हित में ढाल ले। इसी तरह गोदियाल, प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे नेताओं के बीच “मैं मुख्यमंत्री” की अदृश्य होड़ यदि थमी नहीं, तो संगठन की जड़ें और कमजोर होंगी।

देहरादून की यह भीड़ एक संकेत है—कांग्रेस के भीतर जीवन शेष है। पर जीवन तभी गति बनता है जब वह अनुशासन और संगठन से जुड़ता है। रैली के बाद हजारों कार्यकर्ता अपने-अपने गांव लौट गए हैं। असली प्रश्न यह नहीं कि परेड ग्राउंड कितना भरा था; असली प्रश्न यह है कि क्या अब हर गांव में एक बैठक होगी, हर वार्ड में एक समिति बनेगी, हर बूथ पर “अपना आदमी” खड़ा होगा? यदि यह हुआ, तो यह रैली इतिहास में एक मोड़ के रूप में दर्ज होगी। यदि नहीं, तो यह भीड़ भी स्मृतियों की धुंध में खो जाएगी—और विपक्ष की बेचैनी अगले किसी परेड ग्राउंड का इंतज़ार करती रहेगी।

राजनीति अंततः प्रतीकों से नहीं, प्रक्रियाओं से बनती है। देहरादून का परेड ग्राउंड प्रतीक था—अब कांग्रेस के सामने प्रक्रिया गढ़ने की चुनौती है।

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