तीन माह बाद बुग्यालों से गांव लौटीं भेड़-बकरियां, ढोल-नगाड़ों से हुआ भव्य स्वागत

 उत्तराखंड एक्सप्रेस ब्यूरो

मोरी, उत्तरकाशी

तीन माह तक मखमली बुग्यालों में चरान-चुगान के बाद जब भेड़-बकरियों के रेवड़ गांव की पगडंडियों पर लौटे तो माहौल उत्सव में बदल गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच ग्रामीणों ने अपने पशुधन और भेड़पालकों का भव्य स्वागत किया। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी मोरी के गांवों में पशुपालन की समृद्ध संस्कृति और ग्रामीण जीवन की गहरी जड़ों को जीवंत किए हुए है।

बुग्यालों की मखमली ढलानों पर तीन माह तक चरान-चुगान करने के बाद भेड़-बकरियों के गांव लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है। भेड़-बकरियों की घर वापसी पर ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ उनका भव्य स्वागत किया। वहीं, लंबे प्रवास से लौटे भेड़पालकों का भी ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्मान किया।

मोरी विकासखंड में भेड़-बकरी पालन ग्रामीणों की आजीविका का प्रमुख साधन है। यहां गर्मियों के दौरान बड़ी संख्या में भेड़-बकरियों को ऊंचाई वाले बुग्यालों में चरान-चुगान के लिए ले जाया जाता है। करीब तीन माह बाद मौसम में बदलाव के साथ अब पशुधन की गांवों में वापसी शुरू हो गई है। भेड़-बकरियों के लौटने पर ग्रामीणों में भी खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

विकासखंड के पार्क क्षेत्र के जखोल, फिताड़ी, लिवाड़ी, कासला, रेकचा, राला, हरिपुर, धारा, सावणी, सटूड़ी, सूनकुड़ी, ओंसला, गंगाड़, पवाणी, ढाटमीर, मसरी, सेवा, बरी, नूराणू, कलाप, उनाणी, भितरी और खनयासणी समेत करीब 42 गांवों में भेड़-बकरी पालन प्रमुख व्यवसायों में शामिल है। इन गांवों में बुग्यालों से लौटने वाली भेड़-बकरियों के स्वागत की परंपरा आज भी कायम है।

ग्रामीण ढोल-नगाड़ों के साथ भेड़-बकरियों को गांव में प्रवेश कराते हैं और भेड़पालकों का भी आदर-सम्मान करते हैं। ढाटमीर के ग्राम प्रधान हरी सिंह रावत ने बताया कि बुग्यालों से भेड़-बकरियों और भेड़पालकों की वापसी पर स्वागत की यह परंपरा सदियों पुरानी है। बदलते दौर में भी ग्रामीणों ने इस परंपरा को संजोकर रखा है, जो क्षेत्र की समृद्ध पशुपालन संस्कृति और ग्रामीण जीवन की पहचान बनी हुई है।

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