*उत्तरकाशी : ध्याणी मैती मिलन समारोह में ध्याणियों ने भेंट की अपने ईष्ट देवी -देवताओं को सोने चांदी के छत्र व मांग टीका*

जयप्रकाश बहुगुणा 

*बड़कोट /उत्तरकाशी*

ग्राम डख्याट गांव में ध्याणी मिलन व सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें ध्याणीयों ने अपने ईष्ट देवी देवताओं को सोने चांदी के छत्र, मांग टीका व पूजा की थल भेंट किये!बुधवार को नौगांव विकासखंड के अंतर्गत डख्याटगांव में आयोजित ध्याणी-मैती मिलन व सम्मान समारोह आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम बनकर उभरा। यह आयोजन केवल एक पारंपरिक मिलन कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इसमें लोक-आस्था, पारिवारिक संबंधों और पीढ़ियों से चली आ रही रीति-रिवाजों की जीवंत झलक देखने को मिली।


कार्यक्रम में गांव की ध्याणीयों (बहन-बेटियों) ने अपने मायके (मैती) के प्रति प्रेम और श्रद्धा प्रकट करते हुए कुल देवी मां चंद्रबदनी को चांदी का मुकुट और सोने का मांग टीका भेंट किया। इसके साथ ही क्षेत्रीय ईष्ट देवता तटेश्वर महादेव को चार सोने के छत्र और एक विशेष पूजा थाल अर्पित की गई। तटेश्वर महादेव के अगवानी देवता वीर पोखू देवता के लिए चांदी का छत्र समर्पित किया गया, जो स्थानीय देव परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
इसके अतिरिक्त पांच पांडवों के लिए पूजा की थाल और दीपदान तथा कालका माता के लिए चांदी की सूच सामूहिक रूप से भेंट की गई। इन सभी अर्पणों में न केवल श्रद्धा का भाव झलक रहा था, बल्कि यह भी स्पष्ट हो रहा था कि आज भी गांव की बेटियां अपनी जड़ों और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
कार्यक्रम की एक विशेष आकर्षण रही ध्याणीयों और रयणियों (गांव की बहुओं) का एक समान पारंपरिक ड्रेस कोड, जिसने पूरे आयोजन को रंगीन और उत्सवमय बना दिया। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं की उपस्थिति ने माहौल को जीवंत कर दिया और सांस्कृतिक एकता का संदेश भी दिया।
यह आयोजन सामाजिक समरसता का भी प्रतीक बना, जहां गांव की बहन-बेटियां और बहुएं एक मंच पर आकर न केवल परंपराओं को निभा रही थीं, बल्कि आपसी रिश्तों को भी सशक्त बना रही थीं। ध्याणी-मैती परंपरा उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जो मायके और ससुराल के रिश्तों के बीच भावनात्मक सेतु का कार्य करती है।
समारोह के दौरान भक्ति, उल्लास और अपनत्व का वातावरण बना रहा। स्थानीय लोगों ने इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बताया। यह आयोजन यह संदेश देने में सफल रहा कि आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी जड़ों से जुड़ी परंपराएं आज भी जीवित हैं और समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य कर रही हैं।इस अवसर पर ललिता भंडारी, सरिता रावत, अनसुया, मनीषा, कुशमा, उर्मिला, रचना, प्रभा सहित ग्रामवासी उपस्थित रहे!

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